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पितृ पक्ष में उड़द डाल का वैज्ञानिक पहलू

पितृपक्ष या पितर में उड़द दाल का बड़ा खाने की प्रथा के पीछे वैज्ञानिक तथ्य यह है कि काली छिलके वाली उड़द की दाल सिर्फ खाने में ही स्वादिष्ट नहीं होती, बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद होती है l इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन बी-6, आयरन, फोलिक एसिड, कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम आदि तमाम पोषक तत्व पाए जाते हैं l इसे हार्ट से लेकर नर्वस सिस्टम तक के लिए अच्छा माना गया है l आयुर्वेद में तो इस दाल का प्रयोग औषधि के तौर पर भी किया जाता है l उड़द की दाल में मौजूद पोषक तत्व हड्डियों में मिनरल डेंसिटी को बढ़ाने में मदद करते हैं l इससे हड्डियों से जुड़े रोगों का खतरा कम होता है l आयुर्वेद में इस दाल का इस्तेमाल पैरालिसिस जैसी समस्या को ठीक करने के लिए भी किया जाता है l ये हमारे तनाव को कम करने वाली मानी गई है l इनसे कोलेस्ट्रॉल लेवल नियंत्रित रहता है और हाई बीपी की समस्या भी नियंत्रित होती है l ऐसे में दिल की तमाम बीमारियों का जोखिम घटता है l यह पाचन तंत्र  रखने के साथ ही लिवर को पुष्ट बनाती है l इसमें आयरन की प्रचुर मात्रा होती है, जो शरीर में खून की कमी को दूर करती है, साथ ...

कभी खुशी कभी गम

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कभी खुशी कभी गम  कभी खुशी कभी गम, यही तो है जीवन के रंग l जब हो जाता गम से अति व्याकुल मानव, तब उठा ले यदि कोई अनुचित कदम, हो जाता है तब उससे जु ड़ा हर जीवन बेरंग l कभी खुशी कभी गम, यही तो है जीवन के रंग l क्यों एक सतही दुख से दुखी हो अपना आपा खुद से खो देता, हो जाता अनमोल जीवन से हताश, उस परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति ऐ मानव l कर देता पागल हो, खुद के साथ अपनों का भी जीवन बेरंग l कभी खुशी कभी गम, यही तो है जीवन के रंग l यदि जीवन कोई गम ही ना हो तो, हो जाएं तब जीवन पूरा कोरा कागजl यदि हो ना कोई खुशी की चमक किसी आँख में, तब हो जाएं गम से काला हर जीवन l क्यू देख नहीं पाता नादान इंसान मन की आँखों से, श्वेत श्याम रंगों में छुपे जीवन के इंद्रधनुषी रंग l कभी खुशी कभी गम, यही तो है जीवन के रंग l जब घिर जाओ तुम जीवन में नाउम्मीदी की काली रातो में, तब चुप बैठ जाओ एक कोने में, अपनी आँखे मुंद उस अँधेरे में अपनी अश्रुओं की धारा में, विसर्जित कर दो अपनी, सारी पीड़ा, सारे गम l जब तक बरस कर खाली ना जाएं गम के बादल l तब इन्ही रिक्तियों में भर पाओगे तुम पुनः, जीवन में आशाओं के चटक रंग l कभी...

ताजमहल

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 *ताजमहल*  सब महलों से प्यारा एक महल है  l  नाम है जिसका ताजमहल  l  आगरा में सजा प्यारा सा ताज है  l  यह तो महलों का सरताज है  l  कभी रहा यह  शिव  मंदिर, इसकी महिमा बनी अमिट l शिव का जलाभिषेक करती सदा, प्रमाण,अभी भी टपकती बुँदे l नष्ट कर सारे प्रमाण, इसे दिया नया नाम l किसी नें बनवाया और किसी नें कमाया नाम l अब प्रेम का प्रतीक कहलाता ताज l बन गया प्रेमियों के दिल का सरताज l  कहते है बादशाह शहंशाह की,  बेगम थी एक मुमताज महल  l  उसकी मृत्यु पर यह कब्र बनाई,  जिसका नाम अब है ताजमहल  l   विश्व विरासत में शामिल है यह,  सुंदर प्यारा अपना ताजमहल  l  भारत की शान है हमारा अभिमान है,  कहलाए प्रेम प्रतीक ऐ ताजमहल l  चांदनी रात में सौ गुना बढ़ जाती l इसके सुन्दर रूप की सुंदरता l अलग अलग रंगों में है नजर आता, श्वेत संगमरमर से बना  ताजमहल  l (स्वरचित, मौलिक रचना ) लोकेश्वरी कश्यप जिला मुंगेली छत्तीसगढ़ 07/11/2021

आशाओं का प्रकाश

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शीर्षक - आशाओं का प्रकाश  मेरे जलने में तेरी मुस्कुराहट देख अपनी जलन भूल जाती हूँ मैं l मेरा अस्तित्व है बस मामूली, बहुत ही छोटा सा l पर तेरी प्यारी मुस्कान देख, अनमोल हो जाती हूँ मैं l तुम हो उस अनंत की सबसे सुन्दर, प्यारी अमूल्य रचना l उसी अनंत ज्वाला शक्ति की मात्र एक छोटी सी लौ हूँ मैं l थोड़ा ही सही रौशनी कर, तम को तो हरती हूँ मैं l तन मेरा कपास,मेरी प्राण शक्ति है तेल  और घी l मेरा आधार है कच्ची मिट्टी का पक्का दीया l जलती हूँ  मैं, तब समग्र रूप में दीया कहलाती हूँ मैं l कोई जरूरत तो कोई खुशी के लिए मुझे जला जाता है l उफ़ भी नहीं करती, बस चुप ही रहती हूँ l अपना अस्तित्व मिटा कर तेरे दर पे रौशनी करती हूँ मैं l क्या हुआ जो तेरी खुशी, मुस्कुराहट के लिए जल कर मिट गई l खुद जलकर औरों को रौशनी बाँटने का संदेश देती हूँ मैं l जी हाँ दीया हूँ मैं, अंधकार में आशाओं का प्रकाश भरती हूँ मैं l (स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित रचना )  *लोकेश्वरी कश्यप* *जिला मुंगेली छत्तीसगढ़* 07/11/2021

लौह पुरुष को मेरा शत-शत नमन

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💐कविता💐  लौह पुरुष को सत सत नमन जिसने सन् अटठारह सौ संतावन में जन्म लिया गुजरात में,  अपने अधिकारों के विरुद्ध आंदोलन किया शिक्षा काल में,  उन लौह पुरुष को मेरा शत-शत  नमन........  जो प्रथम गृह मंत्री  नियुक्त हुए नेहरू शासनकाल में,  सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण शामिल है इनके ऐतिहासिक कार्य में,  उन लौह पुरुष को मेरा शत-शत  नमन........ जिसने उल्लेखनीय कार्य किया भारत को आजाद कराने में,  भारत को जिसने विशाल और अखंड बनाने की कल्पना की अपने मन में, उन लौह पुरुष को मेरा शत शत नमन.......  संपूर्ण भारत को अखंड  बनाया जिसने अपने अथक परिश्रम से,  अपने दूरदर्शिता और अटल निश्चय से लौह पुरुष कहलाए इस जहान में,  उन लौह पुरुष को मेरा शत-शत नमन.....  लोकेश्वरी कश्यप जिला मुंगेली छत्तीसगढ़

हल्दी की परम्परा

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*हमारी परम्पराओं में निहित विज्ञान* *हल्दी की परम्परा*  भारतीय लोक जीवन में परम्पराओं का अपना एक अलग महत्व है l जो विश्वास और श्रद्धा के आधार पर आज भी जीवित है । ये परंपराएं कब से और क्यों निभायी जाती हैं l इसका जवाब बहुत मुश्किल है lधर्म हो या ज्योतिष या फिर सामान्य जीवन हल्दी के बिना सब अधूरा है l हल्दी खाने का स्वाद तो बढ़ाती है,साथ ही हर मंगल काम की प्रथम शोभा होती है l हल्दी का पीला रंग उसे बृहस्पति से जोड़ता है l ज्योतिष में बृहस्पति को मजबूत करने के लिए हल्दी का प्रयोग किया जाता है l भारत में ब‍िना हल्‍दी की रस्‍म के शादी पूरी नहीं होती। भारतीय व‍िवाह की रस्‍म चाहे उत्‍तर में न‍िभाई जा रही हो या पूरब, पश्‍च‍िम और दक्ष‍िण में यहाँ हर प्रान्त में हल्‍दी की रस्‍म हर जगह न‍िभाई जाती है।        हमारे यहाँ रसोई के अलावा परंपराओं में भी हल्‍दी को एक खास जगह दी गई है। शादी की तमाम रस्‍मों से पहले दूल्‍हा और दुल्‍हन को हल्‍दी लगाई जाती है।  हल्‍दी को सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए व‍िवाह परंपराओं में इसे इतना खास स्‍थान द‍िया गया है। *मान्य...

अहसासों का बंधन

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शीर्षक :- अहसासों का बंधन   हमारे जीवन में अनेक रिश्ते होते हैं l कुछ रिश्ते हमें जन्मजात मिले होते हैं तो कुछ रिश्ते हमें समय के साथ बनाने पड़ते हैं और बनाए जाते हैं हर रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व होता है l  जन्मजात रिश्तो का बंधन  कुछ रिश्ते  हमें जन्मजात मिलते हैं l  यह रिश्ते होते हैं जो हमारे जन्म लेने से पूर्व और जन्म लेने के बाद हम से जुड़े होते हैं  l जिनमें सबसे पहला रिश्ता होता है माता पिता और बच्चे का l जब हमारा जन्म होता है तो हमें माता-पिता के अलावा और भी रिश्ते सत्ता ही मिल जाते हैं जैसे कि बड़े भाई और बहन, चाचा -चाची, दादा- दादी,नानी - नाना, मामा बुआ फूफा मासी, बेटी भतीजी बहन इत्यादि हमें अनेक अनेक रिश्ते जन्मजात मिल जाते हैं बिना परिश्रम के l इन्हें हम खून के रिश्ते भी कहते हैं l  *बनाये रिश्तों का बंधन*  यहां पर कृत्रिम शब्द का अर्थ है कि ऐसे रिश्ते जो हमें जन्मजात नहीं मिलते हैं इन्हें हमें बनाना पड़ता है  l  जैसे कि दोस्त, गुरु, पति अथवा पत्नी, इत्यादि  l यह सारी रिश्ते में रिश्ते हैं जो हमें समाज के...