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हल्दी की परम्परा

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*हमारी परम्पराओं में निहित विज्ञान* *हल्दी की परम्परा*  भारतीय लोक जीवन में परम्पराओं का अपना एक अलग महत्व है l जो विश्वास और श्रद्धा के आधार पर आज भी जीवित है । ये परंपराएं कब से और क्यों निभायी जाती हैं l इसका जवाब बहुत मुश्किल है lधर्म हो या ज्योतिष या फिर सामान्य जीवन हल्दी के बिना सब अधूरा है l हल्दी खाने का स्वाद तो बढ़ाती है,साथ ही हर मंगल काम की प्रथम शोभा होती है l हल्दी का पीला रंग उसे बृहस्पति से जोड़ता है l ज्योतिष में बृहस्पति को मजबूत करने के लिए हल्दी का प्रयोग किया जाता है l भारत में ब‍िना हल्‍दी की रस्‍म के शादी पूरी नहीं होती। भारतीय व‍िवाह की रस्‍म चाहे उत्‍तर में न‍िभाई जा रही हो या पूरब, पश्‍च‍िम और दक्ष‍िण में यहाँ हर प्रान्त में हल्‍दी की रस्‍म हर जगह न‍िभाई जाती है।        हमारे यहाँ रसोई के अलावा परंपराओं में भी हल्‍दी को एक खास जगह दी गई है। शादी की तमाम रस्‍मों से पहले दूल्‍हा और दुल्‍हन को हल्‍दी लगाई जाती है।  हल्‍दी को सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए व‍िवाह परंपराओं में इसे इतना खास स्‍थान द‍िया गया है। *मान्य...

अहसासों का बंधन

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शीर्षक :- अहसासों का बंधन   हमारे जीवन में अनेक रिश्ते होते हैं l कुछ रिश्ते हमें जन्मजात मिले होते हैं तो कुछ रिश्ते हमें समय के साथ बनाने पड़ते हैं और बनाए जाते हैं हर रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व होता है l  जन्मजात रिश्तो का बंधन  कुछ रिश्ते  हमें जन्मजात मिलते हैं l  यह रिश्ते होते हैं जो हमारे जन्म लेने से पूर्व और जन्म लेने के बाद हम से जुड़े होते हैं  l जिनमें सबसे पहला रिश्ता होता है माता पिता और बच्चे का l जब हमारा जन्म होता है तो हमें माता-पिता के अलावा और भी रिश्ते सत्ता ही मिल जाते हैं जैसे कि बड़े भाई और बहन, चाचा -चाची, दादा- दादी,नानी - नाना, मामा बुआ फूफा मासी, बेटी भतीजी बहन इत्यादि हमें अनेक अनेक रिश्ते जन्मजात मिल जाते हैं बिना परिश्रम के l इन्हें हम खून के रिश्ते भी कहते हैं l  *बनाये रिश्तों का बंधन*  यहां पर कृत्रिम शब्द का अर्थ है कि ऐसे रिश्ते जो हमें जन्मजात नहीं मिलते हैं इन्हें हमें बनाना पड़ता है  l  जैसे कि दोस्त, गुरु, पति अथवा पत्नी, इत्यादि  l यह सारी रिश्ते में रिश्ते हैं जो हमें समाज के...

गोदना की परम्परा

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💐*हमारी परम्पराओं में निहित विज्ञान*💐 *गोदना गुदवाने की परम्परा*  गोदना अर्थात शरीर के किसी हिस्से को बार-बार छेदन करना l गोदना प्रथा  हिंदू धर्म में लगभग सभी जातियों और जनजातियों में प्रसिद्ध रही है प्राचीन काल से l गोदना प्रथा धार्मिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से हमारे शरीर व समाज का एक अभिन्न अंग बनकर रहा है l यह प्रथा आदि काल से चला आ रहा है l *गोदने का विस्तार*   गोदेने की इस परंपरा का विस्तार पूरे भारत में अपनी अलग अलग नमो व प्रकारों से जानी जाती है l विदेशो में भी गोदने की परंपरा  हमें दिखाई देती है lखासकर आदिवासी जाति एवं जनजातियों में यह विशेष लोकप्रिय हैं l अलग-अलग जाति व जनजातियों में अलग-अलग प्रकार के गोदना की आकृतियां प्रचलित है l गोदने की यह आकृतियां व डिजाइन उनकी जाति व समाज की विशेष पहचान भी बन गई है l *नाम व विशेषता*   गोदने को अंग्रेजी में टैटू कहा जाता है  l इसे कहीं कहीं गुदना भी कहते है l  यह काले, हल्के नीले व कुछ हरापन लिए हुए अपनी छाप शरीर के  अंगों पर छोड़ता है l वर्तमान में गोद...

शिक्षक

🙏🏻आलेख   "गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरु देवो महेश्वरः गुरु साक्षात परम ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः "  यूं तो हर इंसान अपने आप में यूनिक होता है. अगर हम बात करें शिक्षकों की तो  हर शिक्षक अपने आप में यूनिक होता है और उसके अंदर कुछ विशेष होता ही है. ऐसा भी कहा जाता है कि दुनिया में सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति एक शिक्षक ही होता है, क्योंकि शिक्षक वह व्यक्ति होता है जिसके अंदर हर प्रकार का ज्ञान और कला का वास माना जाता है जो वह अपने बच्चों को देता है और मार्गदर्शन के द्वारा. अपने बच्चों को उनकी जीवन में विशिष्ट उपलब्धियों को हासिल करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है.  जैसे एक शिक्षक शिक्षक गुरु होने के साथ-साथ वह एक मां की भूमिका निभाता है एक पिता की तरह संरक्षण करता है और एक साथी की तरह अपने छात्रों को उचित मार्गदर्शन देता है और उसके सुख दुख में उसका साथ निभाता है साथ ही शिक्षक बच्चों के अंदर की प्रतिभाओं को कभी डांस के माध्यम से कभी गायन के माध्यम से कभी कुछ क्रिएटिव करने के माध्यम से सामने लाता है.  कहने का तात्पर्य है कि शिक्षक चाहे तो क्या नहीं कर सकता? पर यह...

मेरे बिलासपुर में

 *शीर्षक :- मेरे बिलासपुर में*  बिलासपुर छत्तीसगढ़ राज्य का एक प्रमुख जिला है। यह प्रशासनिक एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में राज्य का दूसरा सबसे प्रमुख एवं बड़ा शहर है। बिलासपुर शहर लगभग 400 साल पुराना है l मना जाता है की यह काफी लंबे समय तक मछुआरों की बस्ती रही थी और इसका नाम मत्स्य - महिला (केंवट जाती की महिला ) "बिलासा" के नाम पर रखा गया है।ऐतिहासिक रूप से बिलासपुर, रतनपुर के कलचुरी राजवंश का भाग था।बिलासपुर को लगभग 400 वर्ष पुराना शहर मना जाता है l छत्तीसगढ़ राज्य का उच्च न्यायालय भी बिलासपुर में स्थित है l अतः इसे 'न्यायधानी' होने का भी गौरव प्राप्त है।  शासकीय तौर पर सन 1861 में बिलासपुर जिला का निर्माण किया गया l तब अंग्रेजो का यहाँ शासन था।  यहाँ की प्रमुख नदियाँ - अरपा, लीलागर, मनियारी है l *ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल* 1. रतनपुर :- इतिहास की माने तो कलचुरी वंश के शासक रत्नदेव प्रथम ने 1050 ई. (11 वीं शताब्दी ) में नगर बसाया था l यही कारण हैं इस शहर का नाम रतनपुर पड़ा।  पौराणिक काल में इसे कुबेरपुर के नाम से जाना जाता था। यह तालाबों का शहर के नाम से भी जाना जाता...

गाय का गोबर और विज्ञान

💐*हमारी परम्पराओं में निहित विज्ञान* 💐 *विषय :- गाय का गोबर और विज्ञान* गोबर का नाम सुनते ही शहरों में सब नाक भौ सिकोड़ने लगते हैं l गाय के दर्शन से और उसके गोबर से गाँव में सुबह की शुरुआत होती है lहिन्दू धर्म में गाय को बहुत ही पवित्र पशु माना गया है। ऐसा माना जाता है कि गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। इसलिए गाय को पूजा जाता है। गाय के गोबर को अगर घर में इस्तेमाल किया जाए तो यह भी हिन्दू धर्म में शुभ माना जाता है। गाय के गोबर में लक्ष्मी का निवास माना गया है। इसिलए जब भी किसी भी प्रकार का कोई पूजन होता है तो उस जगह को गाय के गोबर से शुध्द किया जाता है  हमारे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  गाय और गाय के शरीर का प्रत्येक  पदार्थ विशेष गुणकारी और औषधीय महत्व का माना गया है l गाँव में सभी के घरों में सुबह प्रत्येक कमरे और रसोई घर को गाय के गोबर से लिपकर उसे पवित्र व स्वच्छ किया जाता हैं  l घर के बाहर आँगन व गलियों में भी गाय के गोबर के पानी से छिड़काव कर आँगन व गलियों को स्वच्छ व पवित्र करने की परम्परा हैं l यह परम्परा आज की नहीं सदियों पुरानी हैं l ये परम्पर...

इस करवाचौथ

*शीर्षक :- इस करवाचौथ* हे माता,करवाचौथ पे सुन्दर थाल यूँ ही सजता रहे l चंद्रमा की, पिया संग मैं करू सदा आरती यूँ ही, रोली, चंदन संग माता, तेरे आशीष का दीपक सदा जलता रहे l गौरा माता, गणपति संग आती सदा रिद्धि -सिद्धि रहे l बस तुमसे मेरी यही एक विनती है, हे गौरा माता, सदा सुहाग मेरा यूँ ही बना रहे l तेरे आशीष का दीपक सदा यूँ ही जलता रहे ll पैरों में मेरे पायल छन - छन छनकती रहे l उँगलियों में यूँ ही बिछिया सजती रहे l माँग मेरी सदा यूँ ही सिंदूर से दमकती रहे l तेरे आशीष का दीपक सदा यूँ ही जलता रहे ll सुन्दर पैरों में मेरे सुर्ख आलता सजा रहे l मेरी करधनी संग चाबी का गुच्छा सदा रहे l यूँ ही मेरे बाजुओं में बाजुबंद हरदम सजा रहे l तेरे आशीष का दीपक सदा यूँ ही जलता रहे ll  मेरे प्रियतम के अधरों पे मुस्कान यूँ ही सदा रहे l मेरे गले में मोतियों की माला चाहे हो ना हो, हे माता, मेरे पिया की बाहो का हार सदा रहे l तेरे आशीष का दीपक सदा यूँ ही जलता रहे ll नयनों में कजरा, बालो में गजरा महकता रहे l हे माता, देख मेरे होठों की लाली और मधुर मुस्कान, मेरे पिया का मन भौंरा सदा गुनगुनाता रहे l तेरे आशीष का...